मै

"जीवन के हर विषम संघर्ष मे अगर परिणाम देखोगे तो तुम्हारा कल तुम्हारी सोच से उतना ही दुर हो जाएगा..जितना ओस की बुन्दो का ठहरावपन"..
दुर्गेश 'सोनी'

Tuesday, 3 January 2012

सिर्फ़ जीस्त (जिन्दगी)
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मुकम्म्ल जीस्त का चेहरा बडा अजीब है,

रकीब की शाम मे चॉद की रोटी/
कभी फ़ूलो की वादी मे बारुद की ललक है,

कभी सहमे हुए सपनो मे जीने की कहानी,
कही बहते हुए ऑसु मे प्रेम की मशक्कत है,

यहा ना दिन कभी ढलता है
कस्तुरी रात मुफ़लिसी को डराती है,

कभी रिश्ते रिस कर ओझल हो जाते है
कही अनजान दावतो का शहर बन जाते है,

कभी प्रश्नो का ताना बाना बुन जाता है
कही सदिया उत्तर दे जाती है,

कोइ सफ़ेदी मे जुल्म सा कर जाता है
कोइ श्याम सा पत्थर मे पुजा जाता है,

कोइ सीमा मे हाथ जोड मन्नत करता
कही रुहानी मे सर झुक जाता है,

इस मौसम की हर फ़ितरत मे यही दास्ता है
हर इक जीस्त का सिर्फ़ जीस्त से वास्ता है

----दुर्गेश सोनी

Monday, 31 October 2011

1

अक्ल की अल्फ़ सोच मुन्न्वर को बेपाक पैदा करती है/
तिमिर,ये फ़रिश्तो कि नोक नही जो किस्मत से चलती है


--दुर्गेश सोनी

Saturday, 22 October 2011

रिश्ते

रिश्ते
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मशगुल इस जमाने मे तलफ़गार ऑसु बना देते है
इक बिना सीकी रोटी मे हजारो अहसान सुना देते है....

कि बहुत समझा है अपनो को खुशियो मे दुआ मिले
इस फ़रियाद मे वे अपनी नई चादर गिना देते है....

बमुश्किल कहा गये वो कंघन जो मॉ ने बटवारे मे दिए थे
इस गरीबी मे ये चहरे,रिश्तो की असलियत गिना देते है....

कि जिन्दगी के तल्ख कांरवा मे अब बेबस यु रहे
ये मुसाफ़िर को अकेले दिन की कमियॉ सिखा देते है....

----दुर्गेश सोनी'

Thursday, 20 October 2011

मुहब्ब्त

मुहब्ब्त
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छोटी सी मुहब्ब्त हर हया मे गुनाह छिपाए रखती है
एक अनजान को खामोशी से बेजुबान बनाए रखती है...

रस्तो के दरमिया आकाश का बहना एक बहाना है
ये अपने आप को मुफ़लिसो मे दिवान सा बनाए रखती है....

कि अंधेरा अपने फ़क्र पर है जुगनू समन्दर सा डोल रहे
मै खो जाउना इस इनायत मे अपने को सवेरा बनाए रखती है....

खुदा नवाजिस गुलाब जर्रे सा ये दिल महकता रहता है
ये इश्क के मौसम मे हर उम्र को बगिया बनाए रखती है...

--दुर्गेश

Saturday, 15 October 2011

पत्थर

ये रियासत बहुत पुरानी है/
पत्थर की ठोकर इश्क़ निशानी है..

खन्जर चलते नही यहा रो जाते है
कत्ल के गुनाह मे कुछ खो जाते है..

शाम सवेरे उलझन का जाल मुहब्ब्त मे
इस गुनाह मे हर रात जुगनु फ़स जाते है..

खुदा हमको यु बरकत से ना नवाजे
इस मस्जिद के हर नमाजी हस जाते है..

चन्द खतो को हम महकशी समझने लगे
ये गुलामी का इतिहास है शब कुछ कह जाते है..



---दुर्गेश

Wednesday, 10 August 2011

फ़र्क

जिन्दगी तो बेरहम ये है...यहॉ अमीरी ओर गरीबी का ताल्लुक नही..
जहॉ दिखे है वीरान मे चूल्हे ओर दानो की फ़सल..वहा अलसुबह गगनचुम्बी मीनारो की नदिया बहा दो
यहॉ ताल्लुक है !
मीनारो की फ़र्श का दबी फ़सलो से
जो हर समय किनारो से एक दुजे को सच ओर झुठ के गर्व से देखते है .......
(युग परिवर्तन अभी दुर है)

Friday, 5 August 2011

लौट आया वो पक्षी अपने अधकटे पंखो से


लौट आया वो पक्षी अपने अधकटे पंखो से
 कभी चिनाब का मर्म लाल देख
 लालगढ को हाशिये मे सना देख
 हर सपने वहा अजीब तस्कर होते है
 पडो के पत्ते अपने आप गरीब होते है
 चूल्हो का सफ़ेद धुआ बेरंगा है
 बागपन अपने आप लशकर मे रंगा है
 उगता हुआ सूरज लहुलहान है ||
बेहोश चादनी को जगाते लौट आया वो पक्षी अपने अधकटे पंखो से.......

 पत्थर, बेखबर गोली हर आगोश मे विलीन है
 हर शख्स की नजरे अनीत बारुद मे तल्लीन है
 कटी लाशो पर कौओ का पहरा आम नही खास है
 वादियो का हर हिस्सा नुक्त्ताचीनी के आस पास है
 विकास शर्माता है मोद प्रमोद इतिहास के शब्द है
 फ़ुल गुलदान से झड रहे अंतरिक्ष कफ़न मे लब्ध है
 गरीब की पैदाईश वहा मलीन है ||
 ये चला सुनाते हुए लौट आया वो पक्षी अपने अधकटे पंखो से............

 सपना अनमोल भी है जरुरते पूरी क्यो नही रही
 लोकतन्त्र की ताली संसद मे क्यु बज रही
 आखिर वो कौशल बन्दूक से निकल जाये कहा
 अन्धीयारे मे सोये वो दीपक हक से जले कहा
 तितलिया उडती है परो का साया जमी मे बिछता है
 खादी खाकी से हर शक्स वहा जलता है
 कतरा कतरा खून देखकर ||
पीठ पर बोझ डाल लिए लौट आया वो पक्षी अपने अधकटे पंखो से...........
दुर्गेश  सोनी'