उलझनो को अक्सर यु देखता हु सफ़ेद पन्नो की चादर मे
सुलझ गई तो हर महल पर इक आइना मेरा भी होगा
वरना हवेलीयो का द्वार फ़िर एक सफ़ेदी की तलाश मे होगा...
"सोनी"
मै
"जीवन के हर विषम संघर्ष मे अगर परिणाम देखोगे तो तुम्हारा कल तुम्हारी सोच से उतना ही दुर हो जाएगा..जितना ओस की बुन्दो का ठहरावपन"..दुर्गेश 'सोनी'
Wednesday, 20 July 2011
Sunday, 17 July 2011
विरह
"बारिश ने अनन्त रण को छुआ...इतराती परछाइ रुठी हुई है.. माटी के चीर ने काले चादर की ओढ मे खुशियो के सपने को इस तरह से बुना कि... इतिहास काले चादर से निकलकर हरियाली की ओट मे ईद सा छुप गया..भीगा अरमान अकिंचन के द्वार से मावस की काली रात मे स्वेद संग, नग्न बचपन की तरह अद्रश्य भाव मे सो गया...मै इस व्याप्त क्षण मे हर जिज्ञासा हर प्रेरणा को ज्ञात रस की तरह जीता हु" ||
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"सिचता हु धरा को
तो कोइ अरमान पलता है
हर मौसम
मेरा अपना सहता है
मै व्योम नही हु
जो अक्ष से भागता हु
मेरा सपना
पुस की रात
भी बिकता है"
दुर्गेश 'सोनी'
Saturday, 16 July 2011
ज़िन्दगी
ज़िन्दगी
कब तक
इन फ़ुलो को
अर्थविहीन समय मे
इक पल के लिए जन्म देती रहेगी
गुस्ताकी
तेरी सांसो की हवा ने
आखिर
निश्चिन्त पल मे सुला ही दिया...
ना देखा ना सुना ना कहा
बस क्षणभ्रम को पाकर
हर स्पर्श को सहा..
गर्भ का आंचल
कुछ कांटे भी देता है
विरह का हाथ
कुछ सुकुन भी देता है....
मै अबला की
आकांक्षाओ मे हु
जो समय
कुछ खोने भी नही देता
पर आडम्बर
कुछ कहने भी नही देता..
हा
सावन ने जगाया है मुझे
मेरे अपने गोद मे है
पतझड तु वापस कब जाएगा...
माना !
आकाश तेरा है
कुछ पानी भी गिराता है
हर चुभन भी छुआता है
पर मै मौन
अधुरे स्वप्न से
सर नही उठा सकता.....
दुर्गेश 'सोनी'
Thursday, 14 July 2011
शब
शब,नज्म,बेबसी,तन्हाई किन किन ने पाला है मुझे 'इश्क़'
फ़िर क्यु 'वो' मौजुदगी हर समय हमे अवारा कह जाती है
खुशिया,तमन्ना,जहॉ,दिल ये कुछ है जो रखता हु उनके लिए
'खता' वो उनकी नुमाइन्दगी मे इनको खिलौना कह जाती है |
दुर्गेश'सोनी'
फ़िर क्यु 'वो' मौजुदगी हर समय हमे अवारा कह जाती है
खुशिया,तमन्ना,जहॉ,दिल ये कुछ है जो रखता हु उनके लिए
'खता' वो उनकी नुमाइन्दगी मे इनको खिलौना कह जाती है |
दुर्गेश'सोनी'
Wednesday, 13 July 2011
यादें
अब कहानी मे किस्सा उन "मैले आंचलो" का ना रहा
इन भरोसो पे जो गन्दी वफ़ाओ ने अपना हक़ जमाया है
कभी कल्पना मे "मातादीन" के साथ "चांद" मेरा अपना था
अब हर कलम तुझे तेरी सौतन से कुछ नया कहलवाती है ||
"स्वर्णकार"
इन भरोसो पे जो गन्दी वफ़ाओ ने अपना हक़ जमाया है
कभी कल्पना मे "मातादीन" के साथ "चांद" मेरा अपना था
अब हर कलम तुझे तेरी सौतन से कुछ नया कहलवाती है ||
"स्वर्णकार"
Tuesday, 12 July 2011
गरीबी
मै कल था
आज भी हु
अगले सवेरे शायद रहू
गरीबी की वेदना
इन्ही जज्बातो मे रोया करती है
कल कुछ नही खाया
आज का पता नही
अगला भोर
आक्रोशित भाव से
मेरी गडी आंखो मे
चिर निद्रा लाने को बैचेन है
मेरी ज़िज्ञासा
इन्हे सोचकर ही डुबा करती है
मेरा कुटुम्ब
मेरी कलीयो पर निर्भर करता है
कल मैने एक को बेचा
आज भी जा रहा हु
कल के
व्यव्सायी इन्तजार मे है..
यही सब होकर
मेरी कहानी
इस अकेलेपन केसस्ते बाजार मे
खामोश रास्तो की तरह
खत्म हो जाया करती है......
दुर्गेश सोनी
आज भी हु
अगले सवेरे शायद रहू
गरीबी की वेदना
इन्ही जज्बातो मे रोया करती है
कल कुछ नही खाया
आज का पता नही
अगला भोर
आक्रोशित भाव से
मेरी गडी आंखो मे
चिर निद्रा लाने को बैचेन है
मेरी ज़िज्ञासा
इन्हे सोचकर ही डुबा करती है
मेरा कुटुम्ब
मेरी कलीयो पर निर्भर करता है
कल मैने एक को बेचा
आज भी जा रहा हु
कल के
व्यव्सायी इन्तजार मे है..
यही सब होकर
मेरी कहानी
इस अकेलेपन केसस्ते बाजार मे
खामोश रास्तो की तरह
खत्म हो जाया करती है......
दुर्गेश सोनी
खुशी
"इश्क" ने वन मे
"विरह" को यु याद किया
पत्तो को ज्यु तोडकर
कानन को "रौरव" किया
इश्क ने "उछाह" से
प्रेमवन को ज्यु याद किया
विरह जले हर सपने को बगिया से "गंधराज" किया ।।
"सोनी"
"विरह" को यु याद किया
पत्तो को ज्यु तोडकर
कानन को "रौरव" किया
इश्क ने "उछाह" से
प्रेमवन को ज्यु याद किया
विरह जले हर सपने को बगिया से "गंधराज" किया ।।
"सोनी"
Saturday, 9 July 2011
प्रीतम
कोइ रह इश्क़ मे किनारा बन जाता है
कोइ संग कुमकुम के अफ़साना हो जाता है
कोइ भीगी सी पलके
मौन किनारो पर इक कंकर पे रुक जाती है
कोइ हरे-भरे आंगन मे
संग प्रीतम हंसी-ठीठोली कर जाता है
ये दो गीत हर सदी सम-विषम रह जाते है
कोइ संग निवालो को इक दुजे मे दे जाता है
कोइ सुनी रातो मे
भर आंसु का प्याला पी जाता है
'सोनी'
कोइ संग कुमकुम के अफ़साना हो जाता है
कोइ भीगी सी पलके
मौन किनारो पर इक कंकर पे रुक जाती है
कोइ हरे-भरे आंगन मे
संग प्रीतम हंसी-ठीठोली कर जाता है
ये दो गीत हर सदी सम-विषम रह जाते है
कोइ संग निवालो को इक दुजे मे दे जाता है
कोइ सुनी रातो मे
भर आंसु का प्याला पी जाता है
'सोनी'
सजा
अदब से यु दरियादिली की उसने सजा सुनाई
संग खाए उन नीवालो की प्यारी मुहब्ब्त गिनाई
अफ़सोस ये नही--
कि तेरे बचपन ने मुझे कितना अपनाया था
गनीमत वो रेशमी रुमाल तुमने अभी तक मांगा नही......
"सोनी"
संग खाए उन नीवालो की प्यारी मुहब्ब्त गिनाई
अफ़सोस ये नही--
कि तेरे बचपन ने मुझे कितना अपनाया था
गनीमत वो रेशमी रुमाल तुमने अभी तक मांगा नही......
"सोनी"
Thursday, 7 July 2011
लिप्सा
वो यादे बेशर्म है
जो मन मे दिखती है
उसके कल्पित चहरे को
आड्म्बर मे जीने को सहती है
लिप्सा धुमिल है
आनंद का भोर
सुर्योदय से पहले
नग्न रात्रि को आया है
बैचेन चेहरा
उसकी हर एक सांत्वना मे
वासाना की बु देखता है
खुद्दार ये मस्तिष्क
क्यो विचलित करता है
जो प्राण
पतित को आश्रित है.....
'सोनी'
जो मन मे दिखती है
उसके कल्पित चहरे को
आड्म्बर मे जीने को सहती है
लिप्सा धुमिल है
आनंद का भोर
सुर्योदय से पहले
नग्न रात्रि को आया है
बैचेन चेहरा
उसकी हर एक सांत्वना मे
वासाना की बु देखता है
खुद्दार ये मस्तिष्क
क्यो विचलित करता है
जो प्राण
पतित को आश्रित है.....
'सोनी'
तहजीब
तहजीब अगर गुर सिखा सकती है
तो दिल की दामिनी पर एक किरण भी होगी
मत भुलो की वो दिवाना शक्स भी अजनबी था
जिसने खतो पे नाम तुमसे पुछ के लिखा था
'सोनी'
तो दिल की दामिनी पर एक किरण भी होगी
मत भुलो की वो दिवाना शक्स भी अजनबी था
जिसने खतो पे नाम तुमसे पुछ के लिखा था
'सोनी'
आसमान
शहर यु ही अजनबी नही होते
गर कतारो मे खडे लोग अपनी जमी पे होते
आसमान कि सैर का जज्बा तो एक परिन्दा ही जानेगा
इन बेचारो को अक्सर उडाया ही जाता है
"सोनी"
गर कतारो मे खडे लोग अपनी जमी पे होते
आसमान कि सैर का जज्बा तो एक परिन्दा ही जानेगा
इन बेचारो को अक्सर उडाया ही जाता है
"सोनी"
पत्ते
जीवन का मतलब इक औरत ने यु बतलाया
कभी फ़ुलो से बनी थी
फ़ुलो को कही ओर ले जाया गया
उस आंगन को खुशबु से महकाया गया
दो चार जो पत्ते झड गये थे
गुथा गया मरोडा गया सुखा गया
अजब संघर्षो का ये विराम कभी न रुका
अन्त मे उस माली के हाथ कही ओर "बेचा" गया
दुर्गेश 'सोनी'
कभी फ़ुलो से बनी थी
फ़ुलो को कही ओर ले जाया गया
उस आंगन को खुशबु से महकाया गया
दो चार जो पत्ते झड गये थे
गुथा गया मरोडा गया सुखा गया
अजब संघर्षो का ये विराम कभी न रुका
अन्त मे उस माली के हाथ कही ओर "बेचा" गया
दुर्गेश 'सोनी'
साखी
चलो आज फ़ितरत से साखी को कुछ पिलाया जाए
तेरे गम-ए-साख को हर सितम मे बदला जाए
बहुत देखा है समन्दर के आगोश मे तेरी उलझनो को
चलो इन जवाबो को किसी ओर पे फ़ना किया जाए
'सोनी'
तेरे गम-ए-साख को हर सितम मे बदला जाए
बहुत देखा है समन्दर के आगोश मे तेरी उलझनो को
चलो इन जवाबो को किसी ओर पे फ़ना किया जाए
'सोनी'
ठीकाने
नजरे अगर आपस मे मिल जाए
तो क्यु न ये गुनाह भी हो जाए
तु अपने ठीकाने को फ़रिश्ता-ए-गुल मे रख
मेरा जनाजा तेरी बक्शीस को आता ही होगा..
'सोनी'
तो क्यु न ये गुनाह भी हो जाए
तु अपने ठीकाने को फ़रिश्ता-ए-गुल मे रख
मेरा जनाजा तेरी बक्शीस को आता ही होगा..
'सोनी'
तकदीर
खुशियो के शहर मे एक खबर
अंजाने की भी है
हर लब्जो के बयाने गुर की ये कहानी भी है
दिखती खुशिया जो ली है मैने तेरे फ़नकार से
उनमे महरबानी कुछ मेरी तकदीर की भी है ।।
'सोनी'
अंजाने की भी है
हर लब्जो के बयाने गुर की ये कहानी भी है
दिखती खुशिया जो ली है मैने तेरे फ़नकार से
उनमे महरबानी कुछ मेरी तकदीर की भी है ।।
'सोनी'
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